Wednesday, October 28, 2009

!!!गमलों में सज रहे नासिक के फूल!!



!!!गमलों में सज रहे नासिक के फूल!!

ऐसा गांव है मेरा !!! 30 परिवार में तीन ही लिख पाते अपना नाम



बिहार के गया जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर व जगंल-झाड़ के बीच बसा डुमरिया-इमामगंज भारत के अन्य क्षेत्रों से कई मायनो में अलग है।

चारो ओर पहाड़ियों से घिरा गांव- पथलधसा। नक्सल प्रभावित क्षेत्र। 30 परिवार वाले महादलितों के इस गांव में पढ़ाई- लिखाई की कवायद आज भी काठ है। एक भी स्कूल नहीं। नतीजा- गांव के मात्र दो पुरुष और एक महिला ही अपना नाम लिख पाती है। बाकी सब के सब अंगूठा छाप।
गया जिले से लगभग 70 किमी. दूर शेरघाटी अनुमंडल के इमामगंज प्रखंड में है यह पथलधसा गांव। इमामगंज में तो महिला और पुरुषों को साक्षर बनाने के लिए रात्रि पाठशाला तक संचालित की गयी है। महादलित विद्यालय भी है। लेकिन प्रखंड मुख्यालय से लगभग 25 किमी. दूर जंगल में बसे पथलधसा गांव में ककहरों तक की गैर जानकारी ही ठठा रही है।

बस जगदेव सिंह भोक्ता, मुंशी सिंह भोक्ता और सूरजकली देवी ही अपना नाम लिख पाती हैं, किसी तरह। गांव में तकरीबन 350 लोग हैं। फिलवक्त गांव के 80 बच्चे पढ़ना चाह कर भी मजबूर हैं। गांव से स्कूल बहुत दूर है। प्राथमिक विद्यालय सात किमी. दूर है। अभिभावकों का चिंतित होना स्वाभाविक है। उनका सपना बच्चों को पढ़ा- लिखा देखने की है। क्षेत्रीय संकुल संसाधन केन्द्र के साधन सेवी नकुलदेव प्रसाद बताते हैं कि गांव में स्कूल खोलने के लिए बिहार शिक्षा परियोजना को लिखा गया है। ग्रामीण कहते हैं कि अगर गांव में स्कूल खोल दिया जाए तो बच्चे स्कूल जाना भी शुरू कर देंगे।

पथलधसा के ग्रामीणों के पास अपना कुछ नहीं है। जमीन की बंटाईदारी पहाड़ी की तराई में करते हैं जिससे उनके परिवार का गुजारा होता है। इनके पास साम‌र्थ्य नहीं है कि बच्चों को कहीं बाहर भेजकर पढ़ा सकें। बच्चे गाय, बैल, बकरी, सूअर चराते हैं और जंगली फल चुनकर बाजार में बेचते हैं।

मजे की बात तो सह है कि यह इलाका बिहार विधान सभा अध्यक्ष उदयनारायन चौधरी का है। इसके बावजूद आज भी यहां के लोग बाहरी दुनिया से कटे हुए है। खौफ के साये में यह इलाका अब अंगड़ाई ले रहा है। क्षेत्र के लोगों में एक अलग तरह का बदलाव देखा जा रहा है। मानो इलोक में नई बयार बह रही है। इस इलाके ने तमाम आशंकाओं को झुठला दिया है। अब लोगों के बीच खौफ के साये में बस, सुनते जाओं करते जाओं ही मात्र एक तरीका है।

दूसरी ओर एक कहावत है न- 'बशिंदे चाहे कितनी भी हो मगर आदतें नहीं छूटती'। लेकिन देश का एक क्षेत्र ऐसा भी है जहां लोग आतंक के साये में धीरे-धीरे अब अपने अभिवादन के तौर-तरीके को बदलने को मजबूर हो रहे हैं।

फोटो गूगल

Next stop, Delhi (अंक -3)


नोट- भले ही यह कहानी सच के करीब लगे, लेकिन यहां ये कहना लाजिमी है कि इसका किसी लड़की या घटना से सीधे-सीधे कोई लेना देना नहीं है। कहानी में आई घटना का किसी लड़की-विशेष की जिंदगी से मिलना महज एक संयोग हो सकता है!!!

वक्त के उस लम्हे के बतौर गवाह वह ' Radio Taxi' ड्राईवर के सिवा कोई और न था. जब बेवस आंखें संस्थान के गेट के सामने 2 घंटे इंतजार के बाद पूजा (मुलगी) ने Delhi में कदम रखे थे। महीना अगस्त, पहली तारीख, दिन शनिवार. . शाम तीन बजे के करीब.!


इससे पहले यकीनन उसके इंतजार में न जाने क्या सोच कर जुदा-जुदा ख्वाहिशे हिलोरे ले रही रही थी। 'Next stop, Delhi' की खातिरदारी के साथ बेकरारी में !!!

वह सोचे जा रहा था कहां फंस गए .उस वक्त कोई न तो जानने वाल और न ही कोई पूछने वाला। उसके मन में उस ''Next stop, Delhi'' यानी उस पूजा (मुलगी) के खातिर कितनी बेकरारी थी? उसने खास तौर पर उसके लिए दफ्तर से दो दिनों के लिए छुट्टी ले रखी थी। उस वक्त हरेक 10-10 मिनटों पर जानने के लिए किस जगह और कहां पहुंची फोन भी लगा रहा था। मगर यह क्या, out of service .. .. out of service .....

हालांकि एक दिन पहले उसने बताई थी .डियर मैं करीब 1 बजे मेरा ' stop, Delhi' होगा यानी Indira Gandhi Airport पर लैंड करूंगी!! जिंदगी में यह पहला मौका था जब वह किसी लड़की का इंतजार कर रहा था। उस वक्त दिल में उस पूजा (मुलगी) से पिछले मर्तबा हुई बातें निगाहों में छलांग लगा रही थी।

तभी संस्थान की तरफ एक ' Radio Taxi' मुड़ी! उस वक्त 3 बज रहे होंगे। 'Next stop, Delhi'! आखिरकार जिस दिन और जिस पल का इंतजार था, वह अब खत्म हो चुका था। खूबसूरत चेहरा, MUMBAIYA STYLE में बांए कंधे में बैग लिए और रंग बिरगें नये लिबास पहने हुए जब वह गाड़ी से उतरी तो उसके चेहरे पर एक अजीब सी खुशी झलक रही थी। दोनों के उस लम्हे के बतौर गवाह वह '' Radio Taxi' ड्राईवर के सिवा कोई और न था...

हालांकि दोनों के बीच '**Hi, Hello** ' कुछ नहीं हुआ। लेकिन वो इतना जरूर अंग्रेजी के हिदायती लहजे में बोली कि ये 'Delhi Radio Taxi' वाले जो हैं ना,- हे भगवान!!

दबी सी आह और एक दर्द की शिकन चेहरे पर लाते हुए बोली! ..........

बाबू ....तुम्हें पता है? मैं न मुंबई में अपने कमरे से काफी लेट से निकली थी। कोई था ही नहीं. उस वक्त तो मेरा तो मेरे कमरे का चाभी लेने वाला कोई दोस्त भी मौजूद नहीं था और न ही Airport कोई छोड़ने वाला। मैं तो फ्लाइट में सो रही थी।

(इस बात का जिक्र अगले अंक में)*****

रास्ते में कोई और परेशानी तो नहीं हुई इसके अलावा कुछ भी बात नहीं हुई। यह बताना जरूरी होगा कि वह जिसके इंतजार में था उसके लिए वो सारी चीजें थी जो एक मेहमान के स्वागत के लिए किया जाता और दिया जाता है। उस वक्त वह सारी बाते भुल चुका था, कारण जो भी रहा हो। सच तो यह था कि उस वक्त वह अजीब खूबसूरत मेहमान के जानने में सारी बाते भूल चुका था।

कुछ कारणों से बीच की लाइन हटा रहा हूं****

बहरहाल होस्टल में सारा काम निपटाने के बाद तकरीबन एक घंटे बाद कुछ ही देर में दोनों फुरसत का वक्त काटने या दिल बहलाने सरोजनी नगर बाजार निकल गए। दोनों फुटपाथी ठेले पर चाट अभी खाही रहे थे कि एक अजीब वाकयात का जिक्र.। उस पूजा (मुलगी) ने पानी लाने की फरमाइश की। पास की दुकान से पानी ला कर दिया। लेकिन यह क्या............




उसने तो उस प्रकार झपट पड़ी , मानो कितनी प्यासी हो। और उस बोतल को मुह लगा कर पीने लगी। हालांकि यह हर इंसान को पसंद नहीं ।

(हंसती हुई) ...ओ सॉरी- मैं तो इसे मुंह लगा दिया। तुम्हें कोई problem तो नहीं है? ओ Bad Girl....

हालांकि न चाहते हुए भी वह रोक न सका। शायद यह मजबूरी भी हो सकती है या नेकनीयती से बोला जाए तो शायद आपको भले ही यह लगे कि यह नया नया आशकी का राज है। मगर ऐसा कुछ नहीं था। उस वक्त उस मुलगी नजरों में क्या था नहीं मालूम!!

इससे पहले उसने एक मर्तबा मासूमियत से पूछी . ...क्या तूम मेरे साथ बोर तो नहीं हो रहे हो? लेकिन शायद ईमानदारी से बोला जाय तो शायद--? । और आप बोल सकते हैं और समझ सकते हैं।

दोनों की सहमती से अपने घर चलने के इरादे से सरोजनी नगर के बस स्टोप पर आहिस्ता आहिस्ता मुस्कुराते गुनगुनाते आ चुके थे। अब ऑटों के लिए मारा मारी शुरू हो चुकी थी। दोनों ऑटो को रूकवाने में लगे थे। हालांकि वह ऑटों का रूकवाने में कम मुगली को निहारने में जादा ध्यान दे रहा था। उसे क्या पता था कि रात के 8 बज चुके हैं। अभी Jawaharlal Nehru University (JNU) के गांगा ढाबा पर डिनर भी करना है।

JNU दोनों तवा चिकन और चपाती खा ही रहे थे कि यह क्या! टेबल के पास कुछ गुदगुदाहट ओर कुछ फुसफसाहब् महसूस हुई। नीचे जब नजर गई तो एक छोटा सा पप्पी था। वह मुलगी को बड़े प्यार से देख रहा था।

ओ! How Sweet ......!
पहले तो सोचा उसे हटाने के लिए क्यों वह कमीना दोनों के बीच एक रोड़ा बन गया। लेकिन उस मुलगी को कौन कहे। यह कहां का इंसाफ है .उसने अपना कोमल हाथ बढाई और पप्पी को पकड़ कर उसे खिलाने लगी !!

अब रह रह कर दोनों खाने में कम बात करने में जादा समय दे रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो दो प्रेमी कितने दिनों दिनों बाद मिले हैं। उस वक्त दोनों के बीच एक अलग अनुभूति थी। एक अलग माहौल से आई हुई मुलगी से बात करने का मजा ही कुछ और था।

अपने तरफ से बहुत कोशिश कर रहा था कि वह ज्यादा से ज्यादा से बोले। बातों ही बातों में रात के 10 बज चुके थे। उसे होस्टल भी छोड़ना था। JNU के गंगा ढाबा से उस होस्टल की दूरी महज ४ किलोमीटर है।

रात 10 बजे.... JNU की बल खाते राहों और पहाड़ी ऊंची निची सड़कों पें! जिस ऑटो में दोनों बैठे ,महज इतिफाक से उस वक्त ऑटो में Kishore kumar के गाने *****Aankhon me hamne aap ke sapne sajaaye hain***** !! बज रहे थे। उसके भी इस गाने पर नाजुक लब्ज चल रहे थे। उस वक्त कोई भी रहा होता उसे निहारने के अलावा कुछ नहीं कर सकता था।

हालांकि यह दौर ज्यादा देर नहीं चला मात्र 10 मीनटों में ही ऑटो वाले ने यह बोल कर ध्यान तोड़ दिया कि भईयां लो आ गए। उस रात को जाते जाते यह बोल गई कि कल क्या करना है मैं सुबह फोन करती हूं।

उसके बोलने का अंदाज ऐसा था मानों सारी जिम्मेदारी का जिम्मा उठा रखा हूं। शायद वह ऐसा बोल कर वह बताना कुछ बताना चाहती हो !! कोई ना??
शुक्रिया .
अब अगले अंक में !!!